एक बीमार बच्चे को ईलाज के नाम पर पिलाई जाने वाली कडवी दवा को उसके माता पिता उसे ये ही समझाकर पिलाने की कोशिश करते हैं कि दवा कडवी नहीं मीठी ही एक ही सांस में गटक जाओ । माता पिता समझाते हैं कि बेटा आपके स्वस्थ होेने के लिये आपका दवा पीना जरूरी है । दवा के प्रभाव से बच्चा स्वस्थ हो जाता है लेकिन कुछ दिनों के बाद वापस बीमार हो जाता है । माता पिता वापस उसे दवा पिलाते हैं । ठीक होने और बीमार होने का ये सिलसिला जारी रहता है परंतु इस दौरान दवा के रूप में इतने साल्ट बच्चे के शरीर में प्रवेश करवा दिये जाते हैं कि अंततः उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बिल्कुल समाप्त हो जाती है । उसका रक्त अब इन दवाओं से अप्रभावित होता है । बच्चे पर अब कोई दवा असर नहीं करती और एक दिन बच्चे की मौत हो जाती है ।
ये कोई कहानी नहीं है एक हकीकत है जो हमें प्रतिदिन किसी ना किसी रूप् में कहीं ना कहीं देखने को मिल जाती है । यहां एक सवाल ये आता है कि क्या बच्चे को बचाया जा सकता था । शायद हां यदि बच्चे के माता पिता पहली बार बच्चे के बीमार होते ही ये जानने का प्रयास करते कि वो बीमार क्यूं हुआ । घर में फैली गंदगी , दुषित खान पान , पानी का कम पिया जाना और ऐसे ही कुछ छोटे मोटे कारण और थे । बच्चे के माता पिता द्वारा यदि इन कारणों को समय रहते ही दूर कर दिया गया होता तो बच्चा दुबारा बीमार ही ना होता । बच्चे के माता पिता ने दूसरी गलती ये की कि उन्होंने बच्चे का ईलाज एक ऐसे चिकित्सक से करवाया जो अपने ईलाज के लिये प्रसिद्व था । लोग कहते थे कि उसके ईलाज से एक दिन में ही रोगी ठीक हो जाता था लेकिन हकीकत में वो कोई प्रशिक्षित चिकित्सक नहीं था । वो रोगी को 3.4 तरह की दवाईयां देता था ,और उसका ईलाज अपेक्षाकृत मंहगा था । ये उसका नसीब था कि इन 3.4 दवाओं में से कोई ना कोई दवा काम कर जाती थी । रोगी ठीक तो हो जाता था परंतु उसके शरीर को इन दवाओं का दुष्प्रभाव भी झेलना पडता था जिसकी परीणिति अंततः मौत जैसी होती थी ।
अब हम बात करते हैं मूल मुद्वे की । भारतीय अर्थव्यवस्था और इस देश के नागरिकों के साथ भी अब तक यही होता आया है । सरकार चाहे किसी भी दल की रही हो किसी भी सरकार ने व्यवस्थाओं के फेल होने या सरकारी कंपनियों के घाटे में जाने के मूल कारणों को जानने का प्रयास नहीं किया । इसका एक कारण ये भी रहा कि व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से चलाने का दायित्व जिन हाथों में सौंपा गया उनके बारे में ये विचार कभी भी नहीं किया गया कि क्या वे इन व्यवस्थाओं को चलाने के लायक थे । हमारा पार्टी प्रेम और व्यक्ति प्रेम हमेशा हमें उन लोगों के ही पक्ष में खडा रहने को मजबूर करता आया । भले ही एक उड्डयन मंत्री को प्लेन उडाना आना जरूरी नहीं हो लेकिन उसे कम से कम इस क्षेत्र की जानकारी तो होना ही चाहिये और क्या बुराई है यदि एक प्लेन उडाने की काबलियत रखने वाले को उड्डयन मंत्रालय का भार सौ।पा जाये । हमारे अब तक के मंत्रालय इसी प्रकार से चलते रहे है । इन लोगों ने कभी भी प्रशिक्षित डाक्टर की तरह मर्ज का इलाज करने के बारे में नहीं सोचा एक झोला छाप डाक्टर की तरह ही व्यवस्थाओं पर एक्सपेरीमेंट करते रहे । आज देश मंहगाई के जिस दौर का सामना करना पड रहा है वो इसी व्यवस्था की देने है । क्योंकि इन लोगों को कीमतों में वृद्वि ही ऐक आसान उपाय नजर आता है बिना ये सोचे कि देश पर इसका क्या प्रभाव पडने वाला है । परंतु इन्हें इन चीजों से कोई सरोकार नहीं होता ।
वर्तमान सरकार की बात करें तो इसका भी रवैया पुरानी सरकारों से अलग नजर नहीं आता । रेल भाडे में वृद्वि में ये बात स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है । केग की 2013 की रिपोर्ट में ये स्पष्ट रूप से कहा गया है कि रेल्वे के नुकसान में जाने का कारण है इसका कुप्रबंधन । ये भी सिफारिश की गई कि यदि प्रबंधन को सही कर लिया गया तो कोई कारण नहीं बचता कि रेल्वे घाटे में जाये । परंतु इस महत्वपूर्ण रिपोर्ट पर शायद ध्यान ही नहीं दिया गया । यदि ध्यान दिया जाता तो इस अप्रत्याशित वृद्वि से बचा जा सकता था ।केवल इसलिये कि पूर्ववर्ती सरकार द्वारा ही इस बढोतरी की बात की गई थी वर्तमान सरकार अपने फेसले को तर्कसंगत नहीं ठहरा सकती । लोगों ने आपको इस आशा के साथ चुना है कि आप व्यवस्था में पनप रही खामियों को दूर करके एक अच्छा शासन अपने लोगो को देंगे । लेकिन क्या आपके द्वारा व्यवस्थाओं को सुधारने की कवायद की जा रही है ? ये सवाल वर्तमान सरकार अपने आप से करे । राज्यपालों को हटाया जाना , पुरानी सरकार में काम कर रहे अधिकारियों से अपने आपको दूर रखना और इनके ही जैसे कई निर्णय जो अब तक लिये गये हैं उनसे ये ही जाहिर होता है कि आप अपनी व्यवस्था को दुरूस्त करने का प्रयास कर रहे हैं देश की व्यवस्था को नहीं ।
ये कोई कहानी नहीं है एक हकीकत है जो हमें प्रतिदिन किसी ना किसी रूप् में कहीं ना कहीं देखने को मिल जाती है । यहां एक सवाल ये आता है कि क्या बच्चे को बचाया जा सकता था । शायद हां यदि बच्चे के माता पिता पहली बार बच्चे के बीमार होते ही ये जानने का प्रयास करते कि वो बीमार क्यूं हुआ । घर में फैली गंदगी , दुषित खान पान , पानी का कम पिया जाना और ऐसे ही कुछ छोटे मोटे कारण और थे । बच्चे के माता पिता द्वारा यदि इन कारणों को समय रहते ही दूर कर दिया गया होता तो बच्चा दुबारा बीमार ही ना होता । बच्चे के माता पिता ने दूसरी गलती ये की कि उन्होंने बच्चे का ईलाज एक ऐसे चिकित्सक से करवाया जो अपने ईलाज के लिये प्रसिद्व था । लोग कहते थे कि उसके ईलाज से एक दिन में ही रोगी ठीक हो जाता था लेकिन हकीकत में वो कोई प्रशिक्षित चिकित्सक नहीं था । वो रोगी को 3.4 तरह की दवाईयां देता था ,और उसका ईलाज अपेक्षाकृत मंहगा था । ये उसका नसीब था कि इन 3.4 दवाओं में से कोई ना कोई दवा काम कर जाती थी । रोगी ठीक तो हो जाता था परंतु उसके शरीर को इन दवाओं का दुष्प्रभाव भी झेलना पडता था जिसकी परीणिति अंततः मौत जैसी होती थी ।
अब हम बात करते हैं मूल मुद्वे की । भारतीय अर्थव्यवस्था और इस देश के नागरिकों के साथ भी अब तक यही होता आया है । सरकार चाहे किसी भी दल की रही हो किसी भी सरकार ने व्यवस्थाओं के फेल होने या सरकारी कंपनियों के घाटे में जाने के मूल कारणों को जानने का प्रयास नहीं किया । इसका एक कारण ये भी रहा कि व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से चलाने का दायित्व जिन हाथों में सौंपा गया उनके बारे में ये विचार कभी भी नहीं किया गया कि क्या वे इन व्यवस्थाओं को चलाने के लायक थे । हमारा पार्टी प्रेम और व्यक्ति प्रेम हमेशा हमें उन लोगों के ही पक्ष में खडा रहने को मजबूर करता आया । भले ही एक उड्डयन मंत्री को प्लेन उडाना आना जरूरी नहीं हो लेकिन उसे कम से कम इस क्षेत्र की जानकारी तो होना ही चाहिये और क्या बुराई है यदि एक प्लेन उडाने की काबलियत रखने वाले को उड्डयन मंत्रालय का भार सौ।पा जाये । हमारे अब तक के मंत्रालय इसी प्रकार से चलते रहे है । इन लोगों ने कभी भी प्रशिक्षित डाक्टर की तरह मर्ज का इलाज करने के बारे में नहीं सोचा एक झोला छाप डाक्टर की तरह ही व्यवस्थाओं पर एक्सपेरीमेंट करते रहे । आज देश मंहगाई के जिस दौर का सामना करना पड रहा है वो इसी व्यवस्था की देने है । क्योंकि इन लोगों को कीमतों में वृद्वि ही ऐक आसान उपाय नजर आता है बिना ये सोचे कि देश पर इसका क्या प्रभाव पडने वाला है । परंतु इन्हें इन चीजों से कोई सरोकार नहीं होता ।
वर्तमान सरकार की बात करें तो इसका भी रवैया पुरानी सरकारों से अलग नजर नहीं आता । रेल भाडे में वृद्वि में ये बात स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है । केग की 2013 की रिपोर्ट में ये स्पष्ट रूप से कहा गया है कि रेल्वे के नुकसान में जाने का कारण है इसका कुप्रबंधन । ये भी सिफारिश की गई कि यदि प्रबंधन को सही कर लिया गया तो कोई कारण नहीं बचता कि रेल्वे घाटे में जाये । परंतु इस महत्वपूर्ण रिपोर्ट पर शायद ध्यान ही नहीं दिया गया । यदि ध्यान दिया जाता तो इस अप्रत्याशित वृद्वि से बचा जा सकता था ।केवल इसलिये कि पूर्ववर्ती सरकार द्वारा ही इस बढोतरी की बात की गई थी वर्तमान सरकार अपने फेसले को तर्कसंगत नहीं ठहरा सकती । लोगों ने आपको इस आशा के साथ चुना है कि आप व्यवस्था में पनप रही खामियों को दूर करके एक अच्छा शासन अपने लोगो को देंगे । लेकिन क्या आपके द्वारा व्यवस्थाओं को सुधारने की कवायद की जा रही है ? ये सवाल वर्तमान सरकार अपने आप से करे । राज्यपालों को हटाया जाना , पुरानी सरकार में काम कर रहे अधिकारियों से अपने आपको दूर रखना और इनके ही जैसे कई निर्णय जो अब तक लिये गये हैं उनसे ये ही जाहिर होता है कि आप अपनी व्यवस्था को दुरूस्त करने का प्रयास कर रहे हैं देश की व्यवस्था को नहीं ।